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فلاش باك .. الملك

07/13 07:46

تم نشر النسخة الأولى من تلك المقالة في 12-2-2010






هناك...!

فوق أرض أستوطنها الحُمر الأعادي..!

تحت سماء لا يبدو فيها سوي الظلام وصورة الجلادِ..!

في بلاد لم تعترف يوما بمكانتنا نحن الأسيادِ ...!

وسط قوم سرقوا نزيف عيوننا بالغش و الظلم و سطوة الأحقادِ..!

وُلد البطل في عتمة ظلام الأستبدادِ..!

نعم هو..!

هو سليل الملوك...!

من وُلد في حشايا الأبطال..!

من أنجبته مملكتنا البيضاء في أيام قد تواري سحرها...!

من واجه الظلام و بطش الأعادي..!

لمحُوه من زمَن وهو يمرح في ساحة النبلاءِ...!

مرتدياً ثوب الملوك يبارز الحُمر مدافعاً عن شموخ الذاتِ..!

يحرق أرض المعشب مدافعاً عن راية الملك ...

بكل شموخ وفخر وتفانيِ...!

واجه الظلم مرات و مرات ليسير في النهاية ملكاً فوق جثث الكلاب..!

صرخ بحرقة الأحرار مراراً و مراراً من ظلم عصابة الأفساد..!

من ينساها..!!

ليلة بكي فيها وجة القمر...!



مباراة التتويج أمام الخدم ....!

في بداية ثمانينيات القرن الفائت....

علي أرض القاهرة...!

هدف وحيد كفيل بتتويج الملوك....

ويمر الوقت و يمر....

لم يتبقي من الدقائق سوي سبع...!

و يظهر حفيد الملوك من بعيد...!

ويحرز هدف التتويج للملوك...!

هي لحظة....!

تنادت فيها نشوة الفرح لتعانق دموع الربيع المثقلة بهموم السنين..!

مرحت حشود الموت حول أجساد الأعاديِ..!

ولكن هيهات...!

أبي الجلاد أن تهبط عدالة السماءِ..!

لمحناه يضحك ساخرا و يسرق دموعنا لصالح الحمر الأعاديِ..!

هدفا أُستباحت شرعيته أمام عدالة الأوغادِ..!

و الملك يبكي حسرة علي كرة أستسلمت لقرار القوادِ..!

ظل ملكاً غير متوج علي عرش الكرة في بلاد غلب عليها أحمرار

الأعاديِ...!

مجداً ذهب لغيره بذنب أنتمائه للملوك الأسيادِ...!



و حانت لحظة الوداع..!

لحظة بكي فيها قلب الزمالك و شعبه...!

علي رحيله..!

رحيل من أنار درب الحراس...!

من أطرب الحواس...!

من رسم الفرحة علي ملامح الأسياد..!

من غرس في الأرض راية الملوك..!

رحيلك انت يا ملك..!

و تمر السنون...!

و يعود الملك...!

عاد من بعيد...!

وقد أمتلأ رأسة شيباً...!

عاد ليقود معركة فراعنة الأرض علي أرضهم...!

و رغم عواء الذئاب..!

و نبح الكلاب..!

و أعتراض الخدم...!

قاد البلاد للنصر العظيم...!

و كما هي تلك البلاد دوماً..!

لم تعترف بنصره...!

لم تقدر عطائهً...!

و يذهب المجد لغيره بذنب أنتمائه للملوك الأسياد...!

كيف لا تنتصر ولديك قوي الحُمر..!

هكذا قالوا...!

وهكذا برروا النصر...!

و تمر الأيام...!

و تدق طبول الحرب مرة أخري...!

معركة جديدة في أدغال القارة...!

في بلاد قبائل الأشانتي..!

معركة جديدة سيخوضها ابن مملكتنا قائدا لمنتخب تلك البلاد..!

و سهام الغدر تنتظر سقوطه..!

و توقعات الهزيمة تحاصره....!

في زمن أصاب فيه الوهن فرسان الحُمر...!

و لكنه هيهات...!

عاد براية النصر من جديد...!

أنتصر علي الجميع ليعود ملكاً متوجاً من جديد علي عرش الكرة في

أفريقيا..!

و رغم أنف الحُمر الأعاديِ...!

و في زمن لم تكن فيه لقوة الحُمر الكلمة العليا في المعركة...!

لتنعم تلك البلاد بزهو الانتصار ونشوة الفرح من جديد بفضل الملك...!

نصراً لم يتحقق من قبل علي أيدي عليه القوم من المدربين...!

لم يحقق المجد ألا انت يا سليل الملوك...!

و في ليله سقط فيها العرش...!

عرش روما...!

ليله قتل فيها الملك قيصر روما..!

ليله أنحني فيها مارشيلو ليبي أحتراما لحفيد الملوك...!

نصر تاريخي لن يتكرر لعشرات السنين حققه أبن الزمالك علي أبناء

الرومان...!



كم انت رائع يا ملك...!

لو كان هذا زمناً أخر..

لكم تمني الأغريق ان تكون أنت أله الكرة...!


و بعد خسارة يتيمة...!

معركة خاسرة وسط سجل فتوحاتك و أنتصاراتك...!

تعالي نباح الحُمر من جديد...!

أرادوا أنزالك من علي عرش بلادهم..!

و انتظروا الفرصة...!

ولكنك الملك...!

ابن مملكة الأسياد...!

رمز زمالكنا العظيم...!

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